विवाह के लिए शुभ मुहूर्त का बडा महत्व

विवाह मंडप में शादी के बंधन में बंध रहे जोडे के लिए सात फेरों के लिए शुभ मुहुर्त का बडा महत्व है। शादी की तैयारियों, मेहमानों के स्वागत, नाच-गाने की मौज-मस्ती में शुभ मुहुर्त की अहमियत को हम अकसर समझ नहीं पाते हैं। पंडित जी वर-वधू के शुभ-अशुभ ग्रहों का मिलान करके ही विवाह का मुहुर्त निकालते हैं। शुभ मुहुर्त में लिए गए सात फेरे व्यक्ति का दुर्घटनाओं से बचाव करते हैं। विवाह के समय का निर्णय करने के लिए कुंडली में विवाह संबंधित भाव व भावेश की स्थिति, विवाह का योग देने वाले ग्रहों की दशा, अंतर्दशा तथा वर्तमान ग्रहों के गोचर की स्थित देखी जाती है।
ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है। इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए। विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है। व्यक्तिगत, सामाजिक तथा राजनैतिक सभी प्रकार के कार्यो को शुभ मुहुर्त में आरंभ करने से सिद्धि व सफलता प्राप्त होती है।
अंग्रेजी शासकों से स्वतंत्रता प्राप्ति के 24 घंटे बाद इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए हमारे महान नेताओं ने शुभ मुहुर्त का बेताबी से इंतजार किया था। यही वजह है कि हमारा देश आज संसार का सबसे बडा गणतंत्र और समृद्धशाली देशों की पंक्ति में गिना जाता है। सही समय के निर्धारण के लिए पंचाग के 5 तत्व तिथि, नक्षत्र, वार, योग व करण मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त सूर्य व चंद्र पर आधारित महीने, लगता व राशि के भिन्न-भिन्न योग या युति के साथ मिलाकर विवाह के शुभ मुहुर्त का चयन किया जाता है। मुहुर्त का एक महत्वपूर्ण भाग लगता है, जिस पर साधारणतया अधिक ध्यान नहीं दिया जाता। मुहुर्त में बहुत शुभ या अनुकूल बातें ना भी हों, किन्तु यदि लगता का समय ध्यान से निकाला गया हो, तो वह मुहुर्त के दूसरे अंगों द्वारा आई बाधाओं व दोषों को दूर कर देता है। जब बृहस्पति और शुक्र अस्त हो, तो वह समय विवाह के लिए वर्जित है।
महीने में आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक का समय विवाह के लिए ठीक नहीं है। इस समय से बचना चाहिए। सात फेरों के समय शुभ मुहूर्त का विचार करना आवश्यक है। हमारे पूर्व जन्मों के कर्मो या इस जन्म में अनजाने में बुरे कर्म का परिणाम भोगना पडता है। ऎसी स्थिति में शुभ मुहुर्त, मंत्र जाप तथा दानादि ही रक्षा करते हैं। बहुत से लोगों को यह शंका उत्पन्न होती है कि भगवान राम व सीता का विवाह शुभ मुहुर्त में किया गया था फिर भी सीता का रावण ने अपहरण कर लिया और भगवान राम ने सीता का त्याग कर दिया। पर हम ये क्यों भूल जाते हैं कि सीता ने स्वयंवर रचा था वहां मुहुर्त का विचार नहीं हुआ था। उसके उपरांत जो उचित अच्छा समय आया, उसका उपयोग किया गया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि भगवान राम ने मानव अवतार लिया था, अवतार ले कर भगवान राम ने हमें अपनी लीला के रूप में गृहस्थ जीवन की शिक्षा दी है और बताया है कि मनुष्य ऎसी गलती ना करे। शुभ मुहूर्त जिंदगी भर की खुशियां दे सकते हैं, तो क्यों ना इसका ध्यान रखा जाए।

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