वास्तुकला विदेशों में प्रसिद्ध, पर भारत में उपेक्षित

भारतीय वास्तुकला विदेशों में अत्यधिक प्रचलित एवं प्रसिद्ध है, परन्तु अपने ही उद्गम स्थल भारत में उपेक्षित रही है। प्राचीनकाल मं बडे-बडे राजप्रसाद, किले, देवमन्दिर, विद्यालय, तालाब, कूंप, बावडी, बगीचे से लेकर सामान्य निवास स्थान बनने के लिए वेद-पुराण व शास्त्रों में वर्णित वास्तु-विद्या, स्थापत्य कला को आधार मानकर विचार किया जाता था। धीरे-धीरे जनसंख्या की दुर्गति से होती वृद्धि, भूखण्ड की कमी, फ्लैट सिस्टम एवं पाश्चात्य सभ्यता की ऊटंपटांग चकाचौंध से भारतीय भवन कला विकृत होती चली गई।
वैदिन वास्तु विज्ञान कितना प्राचीन... कई आलोचक ऎसा भी आरोप लगाते हैं कि वास्तुशास्त्र का विशेष प्रचलन गत एक दशक से हो रहा है। ऎसी बात नहीं है। आज से पांच हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल में वास्तु विज्ञान अत्यन्त विकसित अवस्था में था। जिसमें नगर निर्माण पर विस्तार से चर्चा मिलती है। इसी काल में मय नामक असुर ने जो कि शिल्पशास्त्र में सिद्ध हस्त था, मय-महात्म्य नामक विलक्षण ग्रन्थ की रचना की जो आज भी उपलब्ध है। द्वापर युग में ही वास्तुशास्त्र प्रवर्तक विश्वकर्मा ने सुवर्णमयी द्वारका नगर का निर्माण किया था। उसकी द्वारका में सुदामा श्री कृष्ण से मिले थे। यह सुवर्णमय द्वारका भगवान श्री कृष्ण की इच्छा से ही समुद्र में लोप हो गई। जिसे आज बेट द्वारका के नाम से जाना जाता है। श्रीकृष्ण ने कहा था कि कलियुग आने वाला है, लोग सुवर्ण के लिए लडेंगे और इस द्वारका को खण्ड-खण्ड कर नष्ट कर देंगे।
इसलिए उस सुवर्णमयी द्वारका को अपने प्रमाण के साथ ही लोप कर दिया। आज से करीब इक्कीस लाख पैंसठ हजार छियान्वें वर्ष पूर्ण त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने अनेक जगह वास्तुविज्ञान का प्रयोग किया था। इसी काल में लंकेश रावण ने श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर नामक सुप्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग की वास्तु प्रतिष्ठा कराई थी। पुराणों में मिले प्रमाणों के अनुसार भगवान शंकर ने अपने मानसिक संकल्प द्वारा निर्मित सुवर्णमयी नगरी की प्रतिष्ठा भी महा विद्वान रावण से कराई थी, जो बाद में उन्होंने दक्षिण के रूप में आचार्य रावण को समर्पित कर दी । वह सुवर्णमयी लंका कालान्तर में समुद्र में लोप हो गई। अनेक पुराणों में वास्तुविज्ञान के सिद्धान्तों पर चर्चा है। वेदों में वास्तुशांति के अनेक मंत्र मिलते है। अत: जितने वेद प्राचीन हैं, अनादि है, उतना ही वास्तुशास्त्र प्राचीन है अनादि है, अनन्त है।

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