कृष्ण जन्माष्टमी-13 वीं शताब्दी के इस मंदिर में प्रत्यक्ष नहीं होता बालकृष्ण का दर्शन, नौ छिद्रों वाली खि़डकी से नंदलाल को निहारते हैं भक्त

उडुपी। श्री कृष्ण जन्माष्टमी (15-16 अगस्त) नजदीक आ रही है, जिसे लेकर कृष्ण भक्तों का उत्साह चरम पर है। देश भर में नंदलाल के कई मंदिर हैं, जहां तैयारियां जोरों पर हैं। ये मंदिर अपने आप में भक्ति के साथ आश्चर्य को समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के उडुपी शहर में स्थित है, जहां छोटी-छोटी खिड़कियों से नंदलाल के दर्शन होते हैं। दक्षिण भारत के इस मंदिर की वजह से शहर को दक्षिण का मथुरा कहा जाता है, जो भगवान कृष्ण की अनूठी और मनमोहक मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। यहां बालकृष्ण के रूप में स्थापित मूर्ति को सीधे नहीं, बल्कि नवग्रह किटिकी नामक नौ छिद्रों वाली खिड़की से देखा जाता है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और कनकदास की भक्ति की कथा के लिए भी जाना जाता है। 13वीं शताब्दी में वैष्णव संत श्री माधवाचार्य द्वारा स्थापित यह मंदिर भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। कर्नाटक पर्यटन विभाग के अनुसार, यहां बालकृष्ण की मूर्ति को भगवान कृष्ण की सबसे सुंदर मूर्तियों में से एक माना जाता है। मंदिर की सबसे खास बात है कनकना किंदी या नवग्रह किटिकी, जो एक छोटी खिड़की है। इसके पीछे एक मार्मिक कथा छिपी है। किंवदंती के अनुसार, भक्त कनकदास, जो नीची जाति के थे, को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। उन्होंने हार नहीं मानी और मंदिर की दीवार में एक छोटी दरार से भगवान से प्रार्थना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण की मूर्ति ने पश्चिम की ओर मुड़कर उन्हें दर्शन दिए। आज भी भक्त इसी खिड़की से नंदलाल के दर्शन करते हैं। पास ही कनकदास मंडप में उनकी मूर्ति स्थापित है, जो उनकी भक्ति की गाथा को जीवंत रखती है। मंदिर में कई अनूठी परंपराएं हैं। यहां हर दिन सुबह 4 बजकर 30 मिनट से रात 9 बजकर 30 मिनट तक भक्तों के लिए द्वार खुले रहते हैं। मंदिर में अन्न दान की परंपरा भी खास है, जहां हर भक्त को मुफ्त भोजन दिया जाता है। इस मंदिर की कई विशेषताएं हैं, जिनमें से एक उडुपी पर्याय उत्सव भी है, जो हर दो साल बाद मनाया जाता है। यह मंदिर के प्रबंधन को आठ मठों (पुट्टीगे, पेजावर, पलिमारु, अदामारु, शिरुर, सोधे, कृष्णपुरा और कनियुरु) के बीच हस्तांतरित करने का प्रतीक है। इस दौरान भगवान कृष्ण की मूर्ति को स्वर्ण रथ और ब्रह्म रथ पर सजाकर झांकी निकाली जाती है। मंदिर परिसर में गोशाला भी है, जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है। उडुपी संस्कृत शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र है, जहां आठ मठों के माध्यम से यह भाषा सिखाई जाती है। पास ही अनंतेश्वर और चंद्रमौलेश्वर मंदिर भी है, जो श्री कृष्ण मंदिर से पुराने हैं। अनंतेश्वर मंदिर वह स्थान है, जहां माधवाचार्य ने आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। उडुपी पहुंचना आसान है। यह बेंगलुरु से 400 किमी और मंगलुरु हवाई अड्डे से 60 किमी दूर है। रेल और सड़क मार्ग से उडुपी अच्छी तरह जुड़ा है। मंदिर शहर के केंद्र में हैं और पास में मालपे, कापू बीच और सेंट मैरी द्वीप जैसे पर्यटक स्थल भी हैं।

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