जानें क्या है एकादशी का महत्व

पुराणों में सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बडा महत्व बताया गया है। पूरे साल में 24 एकादशी आती है। इनमें देवशयनी, देवप्रोधनी और मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथित का बडा महत्व है। संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारवें दिन आती है। एक चन्द्र मास (शुक्ल पक्ष) में चन्द्रमा अमावस्या से बढकर पूर्णिमा तक जाता है, और उसके अगले पक्ष में (कृष्ण पक्ष) वह पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्र से घटते हुए अमावस्या तक जाता है। इसलिए हर कैलंडर महीने (सूर्या) में एकादशी दो बार आती है, शुक्ल एकादशी जो कि बढ़ते हुए चन्द्रमा के ग्यारवें दिन आती है, और कृष्ण एकादशी जो कि घटते हुए चन्द्रमा के ग्यारवें दिन आती हैं। ऎसा निर्देश हैं कि हर वैष्णव को एकादशी के दिन व्रत करना चाहियें। इस प्रकार की गई तपस्या भक्तिमयी जीवन के लिए अत्यंत लाभकारी हैं।

एकादशी का उद्म----
पद्मा पुराण के चतुर्दश अध्याय में, क्रिया-सागर सार नामक भाग में, श्रील व्यासदेव एकादशी के उeम की व्याख्या जैमिनी ऋषि को इस प्रकार करते हैं :- इस भौतिक जगत के उत्पत्ति के समय, परम पुरूष भगवान् ने, पापियों को दण्डित करने के लिए पाप का मूर्तिमान रूप लिए एक व्यक्तित्व की रचना की (पापपुरूष)। इस व्यक्ति के चारों हाथ पांव की रचना अनेकों पाप कमोंü से की गयी थी। इस पापपुरूष को नियंत्रित करने के लिए यमराज की उत्पत्ति अनेकों नरकीय ग्रह प्रणालियों की रचना के साथ हुई। वे जीवात्माएं जो अत्यंत पापी होती हैं, उन्हें मृत्युपयंüत यमराज के पास भेज दिया जाता है। यमराज ,जीव को उसके पापों के भोगों के अनुसार नरक में पीडित होने के लिए भेज देते हैं। इस प्रकार जीवात्मा अपने कमोंü के अनुसार सुख और दु:ख भोगने लगी। इतने सारी जीवात्माओं को नरकों में कष्ट भोगते देख परम कृपालु भगवान् को उनके लिए बुरा लगने लगा। उनकी सहायतावश भगवान् ने अपने स्वयं के स्वरूप से, पाक्षिक एकादशी के रूप को अवतरित किया। इस कारण, एकादशी एक चन्द्र पक्ष के पन्द्रवें दिन उपवास करने के व्रत का ही व्यक्तिकरण है। इस कारण एकादशी और भगवान् श्री विष्णु अभिन्न नहीं है। श्री एकादशी व्रत अत्यधिक पुण्य कर्म हैं, जो कि हर लिए गए संकल्पों में शीर्ष स्थान पर स्थित है। तदुपरांत विभिन्न पाप कर्मी जीवात्माएं एकादशी व्रत का नियम पालन करने लगी और उस कारण उन्हें तुरंत ही वैकुण्ठ धाम की प्राçप्त होने लगी। श्री एकादशी के पालन से हुए अधिरोहण से, पापपुरूष (पाप का मूर्तिमान स्वरूप) को धीरे धीरे दृश्य होने लगा कि अब उसका अस्तित्व ही खतरे में प़डने लगा है। वह भगवान् श्री विष्णु के पास प्रार्थना करते हुए पहुंचा, हे प्रभु, मैं आपके द्वारा निर्मित आपकी ही कृति हूं और मेरे माध्यम से ही आप घोर पाप कमोंü वाले जीवों को अपनी इच्छा से पीडित करते हैं। परन्तु अब श्री एकादशी के प्रभाव से अब मेरा ह्रास हो रहा है। आप कृपा करके मेरी रक्षा एकादशी के भय से करें। कोई भी पुण्य कर्म मुझे नहीं बांध सकता हैं। परन्तु आपके ही स्वरूप में एकादशी मुझे प्रतिरोधित कर रही हैं। मुझे ऎसा कोई स्थान ज्ञात नहीं जहां मैं श्री एकादशी के भय से मुक्त रह सकूं। हे मेरे स्वामी! मैं आपकी ही कृति से उत्पन्न हूं, इसलिए कृपा करके मुझे ऎसे स्थान का पता बताईये जहां मैं निर्भीक होकर निवास कर सकूं।
तदुपरांत, पापपुरूष की स्थिति पर अवलोकन करते हुए भगवान् श्री विष्णु ने कहा, हे पापपुरूष! उठो! अब और शोकाकुल मत हो। केवल सुनो, और मैं तुम्हे बताता हूं कि तुम एकादशी के पवित्र दिन पर कहां निवास कर सकते हो। एकादशी का दिन जो त्रिलोक में लाभ देने वाला है, उस दिन तुम अन्न जैसे खाद्य पदार्थ की शरण में जा सकते हो। अब तुम्हारे पास शोकाकुल होने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि मेरे ही स्वरूप में श्री एकादशी देवी अब तुम्हे अवरोधित नहीं करेगी। पापपुरूष को आश्वाशन देने के बाद भगवान श्री विष्णु अंतर्ध्यान हो गए और पापपुरूष पुन: अपने कमोंü को पूरा करने में लग गया। भगवान विष्णु के इस निर्देश के अनुसार, संसार भर में जितने भी पाप कर्म पाए जा सकते हैं वे सब इन खाद्य पदार्थ (अनाज) में निवास करते हैं। इसलिए वे मनुष्य गण जो कि जीवात्मा के आधारभूत लाभ के प्रति सजग होते हैं वे कभी एकादशी के दिन अन्न नहीं ग्रहण करते हैं।

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