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अगर प्रसन्न हो जाएं मंगल देव तो रंक को बना सकते हैं राजा, भारत के इन मंदिरों में जाकर करें उनका दर्शन

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नई दिल्ली । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली के नव ग्रहों में से मंगल को ग्रहों का सेनापति कहा जाता है। इसे भूमिपुत्र भी कहा गया है। इसके साथ ही बता दें कि इसकी प्रकृति काफी गर्म है, इसका सीधा संबंध व्यक्ति के रक्त से होता है। मंगल ग्रह को साहस, ऊर्जा और आत्मविश्वास के साथ जमीन का भी कारक माना गया है। मंगल मेष और वृश्चिक राशि का स्वामी भी है। इसके साथ मंगल मकर राशि में उच्च और कर्क राशि में नीच का माना गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मंगल ग्रह को बहुत ही क्रूर और उग्र ग्रह माना गया है। ऐसे में जातक की कुंडली के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बाहरवें भाव में मंगल अगर बैठे हों तो वह व्यक्ति मांगलिक कहलाता है। ऐसे में जातक की कुंडली में अगर मंगल दोष हो तो उसके विवाह में परेशानियां आती है और संतान प्राप्ति में भी देरी हो सकती है। कुंडली के पहले भाव से जातक के स्वभाव, सेहत और व्यक्तित्व का संबंध, चतुर्थ भाव से माता, घर, संपत्ति और सुख का संबंध, सप्तम भाव से विवाह, जीवनसाथी का संबंध, अष्टम भाव से मृत्यु, विरासत का संबंध जबकि बारहवें भाव से खर्च और विदेश यात्रा का संबंध होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मंगल का स्वभाव कुंडली में स्थान के अनुसार तीन तरह का होता है, सौम्य, मध्यम और कड़क। ऐसे में ज्योतिषाचार्य अर्जुन शर्मा की मानें तो सौम्य मंगल अगर जातक की कुंडली में हो तो कोई दोष नहीं लगता, मंगल मध्यम हो तो दोष 28 वर्षों में समाप्त हो जाता है लेकिन, जातक की कुंडली में अगर कड़क मंगल हो तो फिर मंगल के दोष को शांत कराना जरूरी होता है। ज्योतिषाचार्य अर्जुन शर्मा बताते हैं कि कुंडली में मंगल किसी शुभ ग्रह के साथ हो या उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो वह सौम्य मंगल होता है। वहीं मंगल शुभ ग्रहों के साथ कुंडली में हो लेकिन उस पर अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो मध्यम मंगल होता है। लेकिन, मंगल ग्रह के साथ पापी ग्रह बैठे हों और उस पर पापी ग्रह की दृष्टि भी पड़ रही हो तो ऐसे जातक की कुंडली में उच्च मांगलिक दोष बनता है। वैसे देवाधिदेव महादेव और हनुमान जी की पूजा-आराधना से मंगल ग्रह के दोषों को शांत किया जा सकता है। ऐसे में हम आज आपको देश के उन खास मंदिरों के बारे में बता रहे हैं जहां मंगल दोष से मुक्ति के लिए पूजा की जाती है। इसके साथ ही इन मंदिरों में दर्शन-पूजन करने से भी जातकों के जीवन से मंगल दोष के दुष्प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। मंगल के बारे में वैदिक ज्योतिष में कहा गया है कि इस ग्रह की स्थिति अगर कुंडली में उच्च की हो तो यह जातक को रंक से राजा बना सकता है। ऐसे में महाकाल की नगर मध्य प्रदेश के उज्जैन को मंगल ग्रह का जन्म स्थान माना गया है। यहां क्षिप्रा नदी के किनारे पर मंगलनाथ का मंदिर है। इसे अंगारेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान शिव ही मंगलनाथ के रूप में विराजमान हैं। उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों में 43 वें नंबर पर इस मंदिर का जिक्र है। इसे विश्व का एकमात्र मंगल ग्रह का मंदिर माना जाता है। कहते हैं यहां मंगल ग्रह की किरणें सीधी पड़ती है। यहीं से कर्क रेखा होकर गुजरती है और सूर्य की सीधी किरणें मंगल ग्रह के प्रतीक शिवलिंग पर यहां पड़ती है। इस मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण के अवंती खंड में मिलता है। इस मंदिर में मंगल दोष से मुक्ति के लिए भात पूजा की जाती है। महाराष्ट्र के जलगांव के पास अमलनेर में मंगल देव का मंदिर है जहां मंगल देव की स्वयंभू और जागृत मूर्ति है। यहां पर मंगलदेव माता भूमि और पंचमुखी हनुमान जी के साथ विराजमान हैं। वहीं, ग्वालियर से सटे घासमंडी में भी प्राचीन शिव मंदिर है। इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन मात्र से मंगल दोष समाप्त हो जाता है। ग्वालियर में स्थित मंगलेश्वर महादेव मंदिर तकरीबन छह सौ साल पुराना है। इस मंदिर में शिवलिंग स्वयंभू है। यह शिवलिंग मंगलवार के दिन प्रकट हुआ था। यहां के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव का यहां दर्शन करने से मंगल दोष दूर हो जाता है। यूपी के मिर्जापुर जिले में मंगलागौरी का मंदिर स्थित है, यहां के बारे में मान्यता है कि यहां केवल दर्शन मात्र से ही मंगल दोष की समस्या खत्म हो जाती है। यहां स्थित मंगलागौरी की मूर्ति रहस्यमयी है। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में भगवान हनुमान जी का एक ऐसा चमत्कारी मंदिर है, यहां दर्शन मात्र से मंगल दोष से भी मुक्ति मिलती है। छिंदवाड़ा जिले के जामसांवली गांव के इस प्रसिद्ध मंदिर में पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम मुद्रा में स्वयंभू हनुमान जी विराजित हैं। इस मंदिर में मंगलवार को हनुमान जी को चोला, लाल रंग का लंगोटा भेंट करना होता है साथ ही झंडा भी लगाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से मंगल दोष से मुक्ति मिलती है।

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