चैत्र नवरात्रि से लेकर उगादी तक, पूरे भारत में हिंदू नव-वर्ष के अलग-अलग रूप

नई दिल्ली । चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि, गुरुवार को त्योहारों का दिन है। उत्तर भारत में इसे नवरात्रि और दक्षिण-पश्चिम भारत में इसे गुड़ी-पड़वा, उगादि और चेटीचंड (सिंधी नव-वर्ष) के रूप में मनाया जा रहा है। त्योहार के नाम भले ही अलग हैं, लेकिन सभी त्योहारों का मकसद खुशी और उल्लास के साथ हिंदू नव-वर्ष का स्वागत करना है। चैत्र का महीना स्वास्थ्य और अध्यात्म की दृष्टि से काफी खास है, जिसमें नीम और गुण का विशेष महत्व है। पहले बात कर रहे हैं चैत्र नवरात्रि की। 19 मार्च से लेकर 27 मार्च तक मां भवानी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। आज घटस्थापना के साथ मां के पहले रूप, शैलपुत्री, को पूजा जाता है, जिन्हें नई शुरुआत और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। हर दिन मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा होगी। गुड़ी-पड़वा और उगादि पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण भारत में हिंदू नव-वर्ष के रूप में मनाए जाते हैं। गुड़ी-पड़वा में घर को नीम की पत्तियों से सजाया जाता है। पूजा से लेकर वंतरवार तक नीम के पत्तों की होती है, जो जीवन के कड़वे और मीठे पलों का प्रतीक होता है। यहां गुड़ी का अर्थ है विजय ध्वज, और पड़वा का अर्थ है प्रतिप्रदा। इस दिन लोग घर में केसरी रंग का ध्वज भी लगाते हैं, जिसे सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। वहीं आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में चैत्र प्रतिपदा को उगादि मनाते हैं। यह भी हिंदू नव-वर्ष के स्वागत का त्योहार है, लेकिन दक्षिण भारत में होने की वजह से उसे अलग नाम से जाना जाता है। उगादि का अर्थ है, नए युग का उदय। आज के दिन लोग सुबह उठकर तेल अभ्यंग से दिन की शुरुआत करते हैं और फिर नीम के पानी से नहाते हैं। नए कपड़े पहनकर नीम और आम के पत्तों से घर को सजाते हैं और नीम और गुड़ से बना मीठा व्यंजन भी मनाते हैं, खासतौर पर पचड़ी। पचड़ी ऐसा व्यंजन है जिसमें एक साथ पांच स्वाद मीठा, खट्टा, कड़वा, तीखा, नमकीन, कसैला मिलते हैं। यह व्यंजन जीवन के हर अनुभव का अहसास कराता है और जीवन में आने वाली हर मुश्किल से लड़ने की शक्ति भी देता है। सिंधी समुदाय में चैत्र के दूसरे दिन चेटीचंड मनाया जाता है, और इस बार चेटीचंड का त्योहार 20 मार्च को मनाया जाएगा। यह त्योहार भी चैत्र माह से शुरू हुए हिंदू नव-वर्ष का प्रतीक है। यह दिन वरूणावतर स्वामी झूलेलाल के प्रकाट्य दिवस और समुद्र पूजा के रूप में मनाया जाता है।

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