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जो युवा- कंप्यूटर, मोबाइल पर लगातार काम करते हैं, उनके लिए नैत्र रोग में वरदान है- चाक्षु उपनिषद

जो युवा- कंप्यूटर, मोबाइल पर लगातार काम करते हैं, उनके लिए नैत्र रोग में वरदान है- चाक्षु उपनिषद

मुंबई. आजकल युवा कंप्यूटर, मोबाइल आदि पर लगातार काम करते हैं, नतीजे में उन्हें कई तरह की आंखों की परेशानियां होती हैं, ऐसे में उनके लिए नैत्र रोग में वरदान है- चाक्षु उपनिषद.
कृष्ण यजुर्वेदीय इस उपनिषद में नैत्र रोगों को दूर करने का मार्गदर्शन किया गया है और इसके लिए नैत्र रोगों को दूर करने के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की गयी है, जिसमें कहा गया है कि- सूर्यदेव अज्ञान-रूपी अन्धकार के बन्धनों से मुक्त करके प्राणि जगत् को दिव्य तेज़ प्रदान करें.
इसमें कहा गया है- हे चक्षु के देवता सूर्यदेव! आप हमारे नैत्रों में तेजोमय रूप से प्रतिष्ठित हो जाएं, हमारे नेत्र रोगों को शीघ्र समाप्त करें, हमें अपने दिव्य स्वर्णमय प्रकाश का दर्शन कराएं, हम आपको नमन करते हैं, आप हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलें, आप हमें अज्ञान-रूपी अन्धकार से ज्ञान-रूपी प्रकाश की ओर ले जाएं.
आपके तेज़ सदृश्य कोई अन्य नहीं है, आप सच्चिदानन्द स्वरूप हैं, हम आपको बार-बार नमन करते हैं.
॥चाक्षुषोपनिषद विनियोगः॥
ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः, गायत्री छन्दः,सूर्यो देवता,ॐ बीजम् नमः शक्तिः,स्वाहा कीलकम्,चक्षुरोग निवृत्तये जपे विनियोगः॥
चक्षुष्मती विद्या
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेज स्थिरो भव।
मां पाहि पाहि।
त्वरितम् चक्षुरोगान् शमय शमय।
ममाजातरूपं तेजो दर्शय दर्शय।
यथा अहमंधोनस्यां तथा कल्पय कल्पय।
कल्याण कुरु कुरु
यानि मम् पूर्वजन्मो पार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधक दुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय।
ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय।
ॐ नमः कल्याणकराय अमृताय। ॐ नमः सूर्याय।
ॐ नमो भगवते सूर्याय अक्षितेजसे नमः।
खेचराय नमः महते नमः। रजसे नमः।तमसे नमः।
असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मां अमृतं गमय॥
उष्णो भगवान्छुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचि प्रतिरूपः।
ॐ विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतिरूपं तपन्तम्।
सहस्त्र रश्मिः शतधा वर्तमानः पुरः प्रजानाम् उदयत्येष सूर्यः॥
ॐ नमो भगवते श्रीसूर्याय आदित्याया अक्षि तेजसे अहो वाहिनि वाहिनि स्वाहा॥
ॐ वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः।
अप ध्वान्तमूर्णुहि पूर्धि-चक्षुम् उग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धां॥
ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः। ॐ पुष्करेक्षणाय नमः। ॐ कमलेक्षणाय नमः। ॐ विश्वरूपाय नमः। ॐ श्रीमहाविष्णवे नमः।
ॐ सूर्यनारायणाय नमः॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
य इमां चाक्षुष्मतीं विद्यां ब्राह्मणो नित्यम् अधीयते न तस्य अक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अंधो भवति। न तस्य कुले अंधो भवति।
अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिः भवति।
विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं पुरुषं ज्योतिरूपमं तपतं सहस्त्र रश्मिः।
शतधावर्तमानः पुरः प्रजानाम् उदयत्येष सूर्यः।                     
ॐ नमो भगवते आदित्याय॥
॥इति स्तोत्रम्॥

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