यहां होती हैं माता सती के नेत्र की पूजा, करती है सभी मुराद पूरी

मुंगेर। बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब 4 किमी दूर भारत के 52 शक्तिपीठो में से एक चंडिका स्थान बना है। जहा माता सती का बायां नेत्र गिरा था। इस कारण यहां नेत्र पूजा होती है। ऎसा माना जाता है कि जिन लोगों को आंखों की बीमारी होती है, माता के दीये से उठने वाली लौ का काजल लगा लेने से वह बीमारी ठीक हो जाती है। यही कारण है कि यहां दूर-दूर से लोग मां चंडिका की पूजा अर्चना करने आते हैं।

उम़डती है भक्तों को भी़ड---
दूर-दूर से श्रद्धालु मां का दर्शन करने आते हैं। सच्चे मान से मां के दरबार में जो भी आते हैं, सभी की मुराद मां पूरी करती हैं। कहा जाता है कि मां के दरबार में मां के भक्त रोते-रोते आते हैं और हंसते-हंसते जाते हैं। मां के दरबार में ना तो कोई बडा है और न ही छोटा। सच्चे मन से जो भी श्रद्धालु आते हैं, मां उनकी मुराद पूरी करती हैं।

एक और पौराणिक कथा---
भगवान विष्णु द्वारा सती के शव के टुक़डे किए जाने की कथा के साथ ही चंडिका स्थान से एक और पौराणिक कथा जुडी हुई है। कहा जाता है कि राजा कर्ण मां चंडिका के भक्त थे और रोजाना मां चंडिका के सामने खोलते हुए तेल की कढाई में अपनी जान दे मां की पूजा किया करते थे, जिससे मां प्रसन्न होकर राजा कर्ण को जीवित करती थी और सवा मन सोना रोजाना कर्ण को देती थी। कर्ण उस सोने को मुंगेर के कर्ण चौराहा पर ले जाकर लोगों को बांट देते थे। इस बात की जानकारी उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को मिली तो वे राजा कर्ण के दरबार में आकर सेवक के रूप में काम करने लगे। एक दिन विक्रमादित्य ने भी कर्ण की तरह सात बार गर्म कढाई में कूद कर मां को खुश किया तो मां ने पूछा की तुम्हें क्या चाहिए। तुम कौन हो।

मां से तीन वर मांगे---
विक्रमादित्य ने मां से तीन वर मांगे- पहला वो अमृत दे दो, जिसे आप राजा कर्ण को देती है। दूसरा वो सोने का भंडार दे दो, जिसे आप रोजाना राजा कर्ण को देती हो और तीसरा यह मां के नाम के पहले राजा विक्रमादित का नाम हो। मां ने वचन के मुताबिक तीन वर दिए, लेकिन वह मायूस हो गई। उसने सोचा कि जब राजा कर्ण आएगा तो में उसे क्या दूंगी। इस कारण मां ने खोलते हुए कढाई को उलट दिया और उसी कढाई के अंदर विराजमान हो गई। आज भी कढाई नुमा गुफा के अन्दर मां चंडी विराजमान है। मां के दरबार में श्रद्धालु दर्शन करने दूर-दूर से आते हैं। यही कारण है कि आज भी इस मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का। मां के विशाल मंदिर परिसर में काल भैरव, शिव परिवार और भी कई देवी- देवताओं के मंदिर हैं जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं।

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