बारह नामों वाली भद्रा है भयानक, समझकर ही करें शुरू काम

माना जाता है कि भद्रा स्वर्ग लोक, पाताल लोक तथा पृथ्वी लोक में रहकर वहां के लोगों को सुख-दुःख का अनुभव कराती है। पंचांगों के अनुसार भद्रा में कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है।


ज्योतिष
शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण के स्पष्ट मान आदि को पंचांग कहा जाता है। कोई भी मंगल कार्य करने से पहले पंचांग का अध्ययन करके शुभ मुहूर्त निकाला जाता है, परंतु पंचांग में कुछ समय या अवधि ऐसी भी होती है जिसमें कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है। ऐसा ही निषिद्ध समय है "भद्रा"। भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया से उत्पन्न भद्रा शनि देव की सगी बहिन हैं। विश्वकर्मा के पुत्र विश्वस्वरूप भद्रा के पति हैं।
भद्रा के बारह नाम हैं -धन्या, दधिमुखी, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली, असुराणा, महामारी, विष्टि, खरानना, कालरात्रि, महारुद्र और क्षयंकरी। भद्रा का स्वरुप भद्रा का स्वरुप अत्यंत विकराल बताया गया है। इनका रंग काला, केश लंबे और दांत बड़े-बड़े हैं। ब्रह्मा जी के आदेश से भद्रा, काल के एक अंश के रूप में विराजमान रहती है अपनी उपेक्षा या अपमान करने वालों के कार्यों में विघ्न पैदा करके विपरीत परिणाम देती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, कृषि, उद्योग, रक्षा बंधन, होलिका दहन, दाह कर्म जैसे कार्य भद्रा के दौरान नहीं किये जाते हैं।
भद्रा के प्रकार
मुहूर्त ग्रंथ के अनुसार शुक्ल पक्ष की भद्रा बृश्चिकी तथा कृष्ण पक्ष की भद्रा सर्पिणी कहलाती है। बृश्चिकी भद्रा के पुच्छ भाग में एवं सर्पिणी भद्रा के मुख भाग में किसी प्रकार का मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। महिर्षि भृगु की संहिता में कहा गया है कि सोमवार और शुक्रवार की भद्रा कल्याणकारी, गुरूवार की पुण्यकारी, शनिवार की बृश्चिकी और मंगलवार, बुधवार तथा रविवार की भद्रा भद्रिका होती है। इसलिए अगर सोमवार, गुरूवार एवं शुक्रवार के दिन भद्रा हो तो उसका दोष नहीं होता है।
कहां और कब रहती है भद्रा
माना जाता है कि भद्रा स्वर्ग लोक, पाताल लोक तथा पृथ्वी लोक में रहकर वहां के लोगों को सुख-दुःख का अनुभव कराती है। जब चंद्रमा मेष, वृष, मिथुन और वृश्चिक राशि में होते हैं तब भद्रा स्वर्ग लोक में रहती है। चंद्रमा के कुंभ, मीन, कर्क और सिंह राशि में होने पर भद्रा पृथ्वी लोक में तथा चंद्रमा के कन्या, तुला, धनु एवं मकर राशि में होने पर भद्रा पाताल लोक में निवास करती है। किसी भी मुहूर्त काल में भद्रा का वास पांच घटी मुख में, दो घटी कंठ में, ग्यारह घटी ह्रदय में, चार घटी नाभि में, पांच घटी कमर में तथा तीन घटी पुच्छ में होता है। इस स्थिति में भद्रा क्रमशः कार्य, धन, प्राण आदि को नुक्सान पहुंचाती है परंतु पुच्छ में भद्रा का प्रभाव मंगलकारी होने से विजय और कार्यसिद्धि दायक होता है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा के पूर्वार्ध, चतुर्थी एवं एकादशी के उत्तरार्ध में तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी के उत्तरार्ध, सप्तमी और चतुर्थी के पूर्वार्ध में भद्रा का वास रहता है।
भद्रा व्रत से परिहार
भविष्य पुराण के अनुसार भद्रा दोष के परिहार के लिए भद्रा का व्रत और उद्यापन किया जाता है। इससे व्रत करने वालों को भद्रा का कोप भाजन नहीं होना पड़ता और उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाते हैं। भद्रा के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए प्रतिदिन स्नान आदि के बाद भद्रा के बारह नामों का उच्चारण करना चाहिए। ऐसा करने से आरोग्य, धन एवं कार्यों में सफलता मिलती है। भद्रा के कारण होने वाले विघ्न से बचने के लिए "छायासूर्यसुते देवि विष्टिरिष्टार्थदायनी। पूजितासि यथाशक्त्या भद्रे भाद्रप्रदाभव।" मंत्र का जप करना चाहिए।
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