कार्तिक मास है कल्याणकारी, पूजा-अर्चना से होंगे वारे-न्यारे

हिन्दू परंपरा में कार्तिक मास सर्वाधिक पवित्र और सभी सुख प्रदान करने वाला माना गया है। इस मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का संहार किया था, इसलिए शिव को त्रिपुरारी और पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान श्री हरि ने प्रलय काल में मत्स्य अवतार धारण करके यह संदेश दिया कि जीवन में तरलता एवं लचीलापन अपनाकर स्वयं के साथ-साथ पूरी सृष्टि की रक्षा की जा सकती है। सिक्खों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। अतः कार्तिक पूर्णिमा को गुरुनानक देव की जयंती भी मनाई जाती है।


कार्तिक पूर्णिमा और पदम् योग
कार्तिक पूर्णिमा के दिन अगर कृतिका नक्षत्र पर चंद्रमा और विशाखा नक्षत्र पर सूर्य हो तो पदम् योग होता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक जीवन में धन, संपदा, सुख, समृद्धि, आरोग्य और संतान सुख आदि प्राप्त करते हैं। माना जाता है कि कृतिका नक्षत्र युक्त कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में भगवान शिव की छः कृतिकाओं शिवा, संतति, संभूति, प्रीति, अनसूया तथा क्षमा की पूजा -अर्चना करने से शिव की कृपा से असीम ज्ञान एवं धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान
शास्त्रों के अनुसार महाभारत के अठारह दिन तक चले युद्ध में मृतक संबंधियों एवं योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए धर्मराज युद्धिष्ठिर ने श्री कृष्ण की प्रेरणा से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक यज्ञ किया और पूर्णिमा को गंगा स्नान करके पूर्ण आहुति दी। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करके पितरों का तर्पण करने से पितृ प्रसन्न होते हैं तथा जातक को पितृ दोषों से मुक्ति मिलती है।

पूजा, व्रत विधान और महत्त्व
कार्तिक पूर्णिमा के दिन व्रत उपवास रखकर चंद्रोदय पर भगवान शिव की छः कृतिकाओं का पूजन किया जाता है। पूजन के बाद चंद्रमा को जल से अर्घ्य देकर उपवास खोलते हैं। इस दिन प्रातः भगवान शिव का जलाभिषेक करने, भगवान विष्णु, सूर्यदेव एवं शक्ति की आराध्या भगवती देवी की आराधना करने, दीपदान करने, तुलसी, पीपल, आंवला जैसे पवित्र वृक्षों पर जल चढाने से स्वास्थ्य, दीर्घायु, पारिवारिक शांति और सम्मान प्राप्त होता है तथा सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। वास्तव में कार्तिक पूर्णिमा मनुष्य के अंदर छुपी आसुरी प्रवृत्तियों काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का शमन कर उसके जीवन में सकारात्मकता एवं पवित्रता विकसित करके देव स्वरुप करने का पर्व है।
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