सावन में कावड पदयात्रा का महत्व और प्रकार

सावन का महीना भगवान शिव जी को समर्पित होता है। इस महीने में शिवभक्त कावड पदयात्रा पर जाते है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन है, लेकिन इस यात्रा को सामाजिक सरोकार से भी जोडकर देखा जाता रहा हैं। काव़ड के माध्यम यह धार्मिक यात्रा का पर्व देवों के देव महादेव की आराधना के लिए है। कावड यात्रा शास्त्रोक्त नहीं है। लेकिन धार्मिक मान्यताओं को मानें तो भगवान परशुराम ने भी हरिद्वार से गंगाजल भरकर मेरठ स्थित पुरा महादेव मंदिर पर चढाया था। उन्होंने यहां कई माह तक भगवान शिव की आराधना की थी।

कहते है इसके बाद से ही सावन माह का महत्व बढ गया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार जब भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से काव़ड यात्रा की शुरूआत हुई।

पंचक में नहीं होती पदयात्रा----
शिवभक्त सावण माह में आने वाले पंचकों में काव़ड पदयात्रा से परहेज करते हैं। पंचक के दौरान लकडी से बने कोई भी सामान नहीं खरीदा जाता, जबकि कावड पूरी तरह लक़डी व बांस से तैयार होती है। जो शिवभक्त पंचक शुरू होने से पहले काव़ड खरीद लेते हैं, वह पंचक में कावड उठा सकते हैं लेकिन जिन शिवभक्तों को नई काव़ड खरीदनी होती है, वह पंचक समाप्त होने के बाद कावड खरीदते हैं।

पांच प्रकार की काव़ड यात्रा---- शिवभक्तों द्वारा ले जाने वाली काव़ड पांच प्रकार की होती है जो कि क्रमश: बैठी काव़ड, खडी काव़ड, दंडौती काव़ड, मन्नौती काव़ड, डाक काव़ड कहलाती है। ऎसा कहा जाता है कि यदि कोई काव़ड पदयात्री गूलर के पे़ड के नीचे से काव़ड लेकर जाते हैं, तो उनकी यात्रा सफल नहीं होती। यह माह भगवान शिव का प्रिय माह है। इसलिए सावण माह में भगवान शंकर की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इसलिए शिवभक्त इस माह में जप-तप-व्रत तीनों करते हैं।

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