ये हैं वास्तुशास्त्र के प्रसिद्ध प्राचीन ग्रन्थ और आचार्य

मत्स्यपुराण की सूची में अठारह वास्तुशास्त्र के उपदेशक आचार्यो की गणना इस प्रकार से की गई है। भृगुरत्रिवसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तधा।
नारदो नग्नजिच्चैव विशालक्ष: पुरन्दर:।।
ब्रrााकुमारो नन्दीश: शौनको गर्ग एव च।
वास्तुदेवोश्निरूद्धश्च तथा शुक्र बृहस्पति।।
1. भृगु
2. अत्रि
3. वसिष्ठ
4. विश्वकर्मा
5. मय
6. नारद
7. नग्नजित
8. विशालाक्ष
9. पुरन्दर
10. ब्रrाा
11. कुमार
12. नंदीश
13. शैनक
14. गर्ग
15. वासुदेव
16. अनिरूद्ध
17. शुक्र
18. बृहस्पति इत्यादि अठारह वास्तुशास्त्र के प्रवर्तक आचार्य कहे गए हैं। वास्तुशास्त्र का अध्ययन अनिवार्य क्यों... वास्तुशास्त्र की उत्पत्ति मानव जीवन की सार्थकता एवं लोक कल्याण की भावना को लेकर हुआ। शिल्पशास्त्र के मर्मज्ञ आदि आचार्य विश्वकर्मा कहते है- वास्तुशास्त्र प्रवक्ष्यामि लोकानां हित काम्यया।
आरोग्य पुत्रलाभं च धनं धान्यं लभेन्नर:।।
इसके अध्ययन में व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य लाभ, आरोग्य प्राप्ति, पुत्र सन्तति का लाभ, धन-धान्य, उत्तम ऎश्वर्य की प्राçप्त होती है। संसार में जितनी भी मानव सभ्यता है वे भवन निर्माण को एक सांसारिक कृत्य मानती है परन्तु, भारत में भवन निर्माण एक धार्मिक कृत्य है। एक आर्किटेक्ट उत्तम भवन तो बना सकता है परन्तु उसमें रहने वाले प्राणी के सुखी जीवन की गारन्टी नहीं दे सकता। परन्तु वास्तु विद्या इस बात की गारन्टी देती है।

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