पूजा साहित्य पुरोहित से खरीदना उचित है........

पूजा साहित्य खरीदने के लिए दुकान मे जाने पर दुकानदार पूछता है- ये सुपारियां,बादाम और छुहारा खाने के लिए चाहिए या पूजा के लिएक् पूजा के सामान और खाने के सामान में फर्क है। पूजा का साहित्य सस्ता एवं निम्न स्तर का होता है। खाने का साहित्य चुना हुआ,प्रथम श्रेणी का एवं महंगा होता है। उनके आकार-प्रकार में भी फर्क होता है। एक जगह के पूजा साहित्य का उपयोग पुरोहित दूसरी जगह भी पूजन में कर लेते हैं। इसी प्रकार तीसरी जगह भी वह उन्हें काम में ले आते हैं। इस तरह एक साहित्य से वह अनेक जगह पूजा करता है और हर बार उसका मूल्य वसूलता है। दुकानों में पूजा साहित्य निम्न स्तर का होता है। अनेक पूजन के बाद इकटा पूजा साहित्य पुरोहित बनिये को सस्ते दामों में बेच देता है। दुकानदार भी यह सामग्री सस्ते भाव में बेचता है। इस तरह चलनी नोट की तरह साहित्य भगवान की पूजा के लिए उपयोग में लाया जाता है।
यह देखकर मन में घृणा उत्पन्न होनी चाहिए परंतु वैसा नहीं होता। कारण स्पष्ट है। पुरोहित एंव यजमान- दोनों में भगवान तथा पूजा के प्रति अर्पण भाव नहीं होता। परिणाम स्वरूप उन्हें पूजा का फल नहीं प्राप्त होता। इस संबंध में शास्त्र सम्मत पूजा साहित्य के प्रकारों को अवश्य समझ लेना चाहिए। पूजा साहित्य के कुल प्रांच प्रकार हैं। पहला प्रकार है- घर में पूजा के उपकरण,चौरंग,पली,पंचपात्र,पटरी,तश्तरी,नैवेद्य,पंचामृत,कपास के वस्त्र,रंगोली एवं चावल आदि। यह साहित्य यजमान के पास सहज उपलब्ध रहता है। दूसरा प्रकार बाजार से लाई जाने वाली चीजें हैं-फल,फूल,पेडा,पान,कदली,कपूर तथा अगरबत्ती आदि।
यह पूजा साहित्य यजमान उत्साह से खरीद लाता है लेकिन पूजा के पान तथा फल आदि छोटे आकार के रहते हैं। तीसरा प्रकार है-बार-बार प्रयोग में आने वाला साहित्य अर्थात प्रतिमा,वस्त्र,ताम्रकलश,पंचपात्र तथा तश्तरी आदि। इसमें तांबे के पात्र एवं प्रतिमा महंगी होती है। इसे खरीदने की आर्थिक स्थिति न होने पर पुरोहित से लेकर उसका उपयोग करने में कोई हर्ज नहीं है। इसके लिए पुरोहित को अल्प दक्षिणा दे देनी चाहिए। परंतु एक पूजा के लिए प्रयोग में लाए गए वस्त्र दूसरी पूजा के लिए उपयोग में लाना गांण है।
यदि ऎसा करने की मजबूरी हो तो उसके एवज में कपास के वस्त्र एवं अक्षत्र का उपयोग करके काम चलाया जा सकता है किंतु सुपारियां,बादाम तथा छुहारे आदि साहित्य पुरोहित से नहीं लेना चाहिए। ब्रrाादिमंडल,वास्तुमंडल एवं ग्रहदेवता आदि के पूजन में उन देवताओं की निश्चित संख्या की सुपारियां रखी जाती हैं। लेकिन केवल चावल के ढेर पर भी देवताओं को आन किया जा सकता है। मुख्य देवता के लिए पान के बीडे पर वरूण कलश की जगह सुपारियां अवश्य रखनी चाहिए जो बडी और गोल होनी चाहिए। बीडे पर रखे जाने वाले बादाम तथा छुहारे भी बडे और उत्तम प्रकार के होने चाहिए। पूजा के लिए प्रयुक्त साहित्य पुरोहित अपने घर अवश्य ले जाए परंतु वह उसे दूसरों को न बेचकर घर के लोगों तथा मित्रों को दे। पूजा साहित्य बेचने पर देवपूजा की पवित्रता तो नष्ट हो जाती है; श्रद्धा ,भक्ति एवं देवता पूजन के फल से भी वंचित होना पडता है।

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