अबूझ पहेली है ये शिवलिंग, पाताल तक है लंबाई

यूँ तो प्रत्येक शहर और गाँवों में शिव के अनेकों शिवालय है, जिनमें से अधिकतर का अपना अलग पुरातात्विक और पौराणिक महत्व भी है। पुराणों में बारह ज्योर्तिलिंग के अलावा भी शिव के पवित्र स्थानों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक स्थान से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं तथा इसका खगोलीय महत्व भी है।
आज आपको एक ऐसे शिवलिंग के बारे में बताने जा रहे है। 11वीं सदी के अष्टकोण में बने प्रसिद्ध ‘दुग्धेश्वरनाथ मंदिर’ में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है, इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। सबसे खास बात यह है कि यहां लिंग को किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, बल्कि यह स्वयं धरती से प्रकट हुआ है। यह मंदिर उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले के रुद्रपुर कस्बे के पास स्थित है। यह स्थान बहुत प्राचीन है। इनकी चर्चा चीनी यात्री फ़ाह्यान ने भी की है।

मान्यताओं के अनुसार--
सैकड़ो वर्ष पूर्व यह स्थान घने जंगलों से घिरा था और जहां कुछ चरवाहे अपनी गायों को चराने के लिए आते थे। लोगों के अनुसार जंगल में एक टीले के पास एक गाय खड़ी हो जाती थी और उसके स्तनों से स्वत:दूध की धारा बहने लगती थी। धीरे धीरे यह बात आग की तरह फैल गई। इस बात की जानकारी उस समय के राजा हरी सिंह को हुई। उन्होंने इस सम्बन्ध में काशी के पंडितों से चर्चा की, और उस स्थान की खुदाई कराने लगे।
खुदाई के बाद एक शिव लिंग दिखाई पड़ा लेकिन ज्यों ज्यों शिवलिंग को निकालने के लिए खुदाई होती गई, वह शिवलिंग अदंर की ओर धंसता गया। बाद में उस समय के राजा हरी सिंह ने 11 वीं सदी में काशी के पंडितों को बुलाकर वहां एक मंदिर बनवाया।

दूर दूर व्यापारी आकर लगाते है दुकाने---
वैसे तो यहां वर्ष भर भक्त आते रहते हैं लेकिन महाशिवरात्रि, अधिक मास और श्रावणमास में भक्त दूर दूर से भगवान शिव की पूजा आराधना के लिये आते है। इन विशेष अवसरों पर यहां मेला भी लगता है। जिसमें दूर दूर व्यापारी आकर अपनी दुकाने लगाते है।

क्या कहते है पुजारी--
मंदिर के बारे में पुजारी ने बताया कि यह काशी क्षेत्र में ही आता है और शिवपुराण में इसका वर्णन है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन की भांति इसे पौराणिक महत्ता प्रदान की गई है। यह उनका उपलिंग है। ग्यारहवीं सदी में इस मंदिर का निर्माण तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरीसिंह ने करवाया था। जिनका सत्तासी कोस में साम्राज्य स्थापित था। यह भी कहा जाता है कि यह मंदिर ईसा पूर्व के ही समय से यहां है। पुरातत्त्व विभाग के पटना कार्यालय में भी ‘नाथबाबा’ के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर के संबंध में उल्लेख मिलता है।

लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढिय़ां नीचे उतरते है भक्त---
मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है।

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