आयु में कमी बताने वाले योग ..

जन्म कुण्डली में ग्रहों की स्थिति आयु वृद्धि व आयु हान या कमी को बताती है। कमी होने पर जातक के जीवन की सुरक्षा के लिए अनिष्ट ग्रहों की पहचान करना अनिवार्य हो जाता है तत्पश्चात् उनकी शांति के विधान भी अपनाए जाते हैं। जन्म पत्रिका में अल्पायु मध्यायु या दीर्घायु का çानर्णय करके इन ग्रह योगों पर विचार करना चाहिए। अल्पायु जातकों की पत्रिका में अरिष्टकारक योग प्रारंभिक अवस्थाओं में ही प्रबल हो जाते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में सावधानी रखना अत्यन्त आवश्यक है। अल्पायु वाले जातकों की आयु रक्षा के लिए 4 से 8 वर्ष की अवस्था में ही आयु वृद्धि के पूख्ता उपाय कर लेने चाहिएं। चाहे दशा मारकेश की आए या नहीं आए क्योंकि योग किसी एक ग्रह से तो बानता नहीं , अनेक ग्रहो के संयोग से योग बनते हैं और कभीना कभी किसी न किसी ग्रह का प्रभाव जातक पर होता है। दीर्घायु योग वालों की पत्रिका मे अरिष्ट योग होते हैं तो अयोगकारक ग्रहो ंçी दशान्तर्दशा या अशुभ गोचर या साढे साती आने पर यदि सावधानी ना रखी जाए तो भंयकर खतरा उत्पन्न हो जाता है।
अरिष्ट योग :
1= जन्म कुण्डली में दशम भाव से चतुर्थ भाव के बीच केवल पाप ग्रहों का तथा चतुर्थ से दशम भाव के नीच केवल शुभ ग्रहों का होना अरिष्टकारक हेता है। इस योग मे ंबाल्यावस्था में ही जातक को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
2= लग्न और सप्तह भाव में केवल पाप ग्रह हों चंद्रमाा भी पाप ग्रहों से युत हों और इन तीनों स्थानों पर शुभ ग्रहों का प्रभाव नही हो तो भी जातक को अçन्ष्ट आते हैं। ये अनिष्ट बचपन से किसी न किसी रोग के रूप में बने रहते हैं।
3= लग्न से 12 वें भाव में अत्यंत क्षीण चंद्रमा हों लग्न व अष्टम में केवल पाप ग्रह स्थित हों और शुभ ग्रहों का दृष्टि या युति सम्बन्ध नही हो तो भी जीवन को खतरा होता है। इन योगों से ऎसा लगता है कि लग्न व लग्नेश कमजोर होने पर चंद्रमा आयु की रक्षा कर लेते हैं। इन दोनों के बलहीन हो जाने पर अष्टम चंूकि आयु का भाव है अत: वहां शुभ ग्रह हों तो वहां से भी आयु की रक्षा की जाती है, साथ ही तीसरे भाव में भी शुभ ग्रहों का प्रभाव आयु की रक्षा करता है लेकिन ये सभी स्थान केवल पाप ग्रहेा से ही युत या दृष्ट हों तो आयु की रक्षा मुश्किल से होती है।
4= जन्म लग्न से चतुर्थ सप्तम भाव में चंद्रमा स्पष्ट पापकर्तरि में हों तो जीवन को संकट बताते हैं।
5= यदि आश्विन कृƒण अमावस्या का जन्म हो अर्थात् कन्या राशि में सूर्य व संद्रमा दोनों स्थित हों और पाप ग्रहों से दृष्ट हों तो ऎसे जातक के भाई बंधु ही उसकी आयु के दुश्मन हो जाते हैं।
6= जिन जातकों की जन्मपत्रिका में कर्क राशि में शनि और मकर राशि में चन्द्रमा हों उन्हें जल प्रपात, नदी, नहर, समुद्र, अतिवष्ााüक से तथा पीने योग्य जल को लेकर अति सावधानी रखनी हाती है। इनकी आयु को जल से खतरा होता है चाहे जल अधिकता हो जाए या जल की कमी हो जाए।
7= इसी तरह मेष या वृश्चिक राशि मे दो या दो से अधिक पापग्रहों के मध्य चन्द्रमा हों तो उस जातक को अगि्न से भय होता है। अगि्न या विद्दाूत के मामले में उसे लापरवाही नहीं करनी चहिए अन्यथा तत्क्षण काल उपस्थित हो सकता है।
8= मकर या कुंभ राशि में दो पापग्रहों के मध्य चन्द्रमा हों और शुभ गंहों की दृष्टि से रहित हों तो ऎसे जातक को ऊँचाई से गिरकर मृत्यु होने की संभावना अधिक रहती है।
9= जन्म लग्न से चौथे मंगल अथवा सप्तम में सूर्य दैर दशम में मंगल हों तो जातक के आपराधिक मामलाके में फंसने और सरकारी दण्ड के काण मृत्यु या मृत्य तुल्य कष्ट प्राप्त होने के योग बन जाते हैं। 10= जन्म कुण्डली के दूसरे भाव में शनि, चौथे में शनि से दृष्ट चन्द्रमा और दशम में मंगल स्थित हों तो किसी भी गंभीरता से लेना चाहिए। टिटनेस सुरक्षा 2-4 के आयु में कमी अंतराल में नियमित लेते रहना चाहिए क्योंकि किसी घाव के पक जाने और उस घाव में कीडे या मवाद पड जाने के कारण असाध्य रोग हो ताने से मृत्यु हो सकती है।
11 = जन्म कुण्डली में चौथे भाव में स्थित मंगल,दशम भाव स्थित सूर्य से दृष्ट हों तो ऎसे जातक को वाहन चलाने में कभी भी लापरवाही नहीं बनतनी चाहिए। वाहन चलाते समय किसी भी प्रकार के नशे से परहेज रखना आयु के लिए आवश्यक है क्योंकि इस योग में वाहन से गिरकर या टकराकर मृत्यु होने की संभावना रहती है।
12= जन्म लग्न से अष्टम में क्षीण चन्द्रमा हो और बलवान मंगल से दृष्ट हों तो जातक को गरिष्ठ भोजन और तेज मिर्च मसाले तथा अधिक उपवास से दूर रहाना हितकारी होता है। यदि लापरवाही रहे तो बवासीर गुर्दा रोग या आत्र रोग से मृत्यु यंभावित होती है लेकिन बलवान मंगल से दृष्ट अष्टम भाव में शनि हों तो ऎसे जातक को निर्जन स्थानो ंपर जंगंल में या कीडे मकोडों से युक्त स्थान पर अधिक समय ानहीं रहाना चहिए। इन जातकों का शरीर कीडे मकोडों के दंश का प्रतिरोध करने में पूर्ण सक्षम नहीं होता है और इान कीडे मकोडों के दंश से उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
13= जन्म कुण्डली में शनि और चन्द्रमा एक ही राशि व भाव में हों और बलवान मंगल से दृष्ट हों तो किसी अयाध्य या कठिन रोग बने रहनो की अधिक संभावना हो जाती है। जिनकी पत्रिका में यह योग होता है वे जातक अपना जीवन निस्सार समझने लगते हैं क्योंकि अनेक औषधि प्रयोग करने पर भी रोग समाप्त नहीं होता । अपरोक्त स्थिति में ग्रह जब जन्मपत्रिका में होते हैं तो आयु व शरीर में दत्पन्न होने वाले रोगों या वे परिस्थितियां जिनेसे जान को खतरा हो सकता है, उनका पता कर सकते हैं और किसी व्यक्ति को सलाह दे सकते हैं कि उन्हें क्या सावधानी रखनी चाहिए। जिस चीज से जिसको खतरा होता है उसका उस चीज पर बडा आकर्षण होता है, ऎसा अक्सर देखा जाता है।

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