एक्युप्रेशर द्वारा सिरर्दद का उपचार

एक्युप्रेशन एक चिकित्सा पद्धति है, जो आजकल की चिकित्सा पद्धतियों से सर्वथा भिन्न है। इस प्रद्धति के द्वारा किसी भी बीमार व्यक्ति का उपचार करने में कोई हानि नहीं होती या इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडता। आजकल विश्व के साथ-साथ भारत में एक्युप्रेशर द्वारा चिकित्सा का रूझान बढ रहा है। वास्तव में, यह एक अति प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है, जिसके बारे में विश्वास के साथ कहा जाता है कि यह चीन से तमाम विश्व में फैली है। अनौपचारिक रूप से चीन में अधिकांश लोग इस पद्धति के द्वारा रोग निवारण का कार्य करते है। पर यह मत सबसे भिन्न है कि हो सकता है ये चीन की विद्या हो, पर इसे करने के लिए जिन बातों का ज्ञान होना आवश्यक है, वह सिर्फ हमारे वेदों में मिली हैं और जो बिजली पांचों तवों पर अपना प्रभुत्व रखती है, वह बैटरी गर्भाधान के समय आती है और जिसे देखने के लिए योग और कपाल क्रियाओं को करना पडता है।
हमारे ऋषि मुनियों ने इस बैटरी के प्रकाश को स्वीकारा है और जिस प्रकाश को देखने की बात हमारे ऋषि मुनियों ने की है, उस विद्युत से निकली प्रवाह, जो तरंग रूपी होती है, उन्हें हम लाइनें भी कह सकते है। इन लाइनों को मेरीडिअन्स कहते हैं। यह मेरिडिअन्स दाहिने हाथ की अंगुलियों व अंगूठे के शीर्ष स्थान से शुरू होकर दाहिने भाग में घूमता हुआ पैर व अंगूठे व अंगुलियों के अंतिम छोर तक पहुंचता है। इस प्रकार बायें हाथ की अंगुलियों के शीर्ष स्थान से उत्पन्न प्रवाह शरीर के बायें भाग में घूमता हुआ बांये पैर के अंगूठे व अंगुलियों के छोर तक पहुंचता है। जब तक चेतना का यह विद्युत प्रवाह शरीर में ठीक से घूमता रहता है, तब तक शरीर स्वस्थ रहता है। क्षमता से अधिक मेहतन व मानसिक तनाव के कारण जब यह विद्युत प्रवाह शरीर के किसी भी अवयव तक ठीक से नहीं पहुंच पाता, तब वह अंग अपनी कार्यशीलता में शिथिल पड जाता है।
जिसके परिणामस्वरूप पीडा एवं रोग उत्पन्न हो जाता है। यदि इस प्रवाह को उस बाधित अवयव तक पहुंचा दिया जाये, तो पीडा अथवा रोग का निवारण हो जाता है। इस विद्युत प्रवाह को आवश्यक स्थान तक पहुंचाने के लिए जो प्रकृति ने हमारे शरीर में रचना की है, उसी पर ये चिकित्सा प्रणाली आधारित है। इस विद्युत प्रवाह के बाधित हो जाने पर अथवा रोग या पीडा उत्पन्न हो जाने पर हम विशेष स्थान पर सुई चुभोकर इस विद्युत प्रवाह को यथा स्थान पर पहुंचाते हैं, इसे एक्युपंचर कहते हैं और बिना सुई के चुभाए हाथ के अंगूठे व अंगुलियों के द्वारा प्रेशर डालने पर विद्युत प्रवाह को सुचारू रूप से चालित करना एक्युप्रेशर कहलाता है। इस प्रकार हमे देखते है कि एक्युपंचर और एक्युप्रेशर में केवल सुई का अन्तर है।
जब हम एक्युपंचर विधि का प्रयोग न कर, एक्युप्रेशर का प्रयोग करते हैं, तो हमें उन स्थानों का पता होना चाहिए, जहां से दबाव डालने पर हम अपनी वाछित स्थिति में विद्युत का प्रवाह कर सकें। आजकल एक्युप्रेशर का प्रयोग रोग मिटाने के लिए किया जाता है, और सबसे बडी बात यह है कि आज पूरा विश्व ही एक्युप्रेशर पद्धति को अपनाने में केवल रूचि ही नहीं रखता, अपितु इस विद्या को अपनाकर इसे आगे बढाने में मदद कर रहा है। संसार के कई प्रतिष्ठित विद्यालयों में एक्युप्रेशर की बाकायदा वैज्ञाानिक तरीके से पढाई की जाती है।
इसके अतिरिकत अन्तरराष्ट्रीय आरोग्य संस्थान भी इस पद्धति की ओर आकर्षित हो चुका है। एक्युप्रेशर केवल हाथ में अंगूठे व अंगुलियों के द्वारा ही किया जाता हो, ऎसा भी नहीं है। इसमें भी कई तरह के उपकरण प्रयोग में लाये जाते है। जब हाथ के अंगूठे व अंगुलियों के द्वारा दबाव पूरी मात्रा में नहीं पडता अथवा अंगूठे व अंगुलियों से एक विशिष्ट स्थान पर दाब देने के अतिरिक्त दूसरे विशिष्ट बिन्दु पर या एक साथ एक जगह के कई बिन्दु पर दबाव डालना होता है, तो एक्युप्रेशर में प्रयोग होने वाले उपकरणों की सहायता ली जाती है। एक्युप्रेशर चिकित्सा हेतु आवश्यक निर्देश
1. जिस कमरे में रोगों का उपचार किया जा रहा हो वह कमरा साफ, हवादार व शान्त होना चाहिए।
2. उपचार के समय रोगी को सही स्थिति में रखने के बाद प्रेशर दें।
3. रोगी में जीवन के प्रति अच्छी भावना पैदा करना आवश्यक है।
4. रोगी को बिठाकर अथवा लिटाकर चिकित्सा करनी चाहिए।
5. चिकित्सक को शान्तचित्त, सेवाभाव, सुविचार, रोगमुक्त व लगन वाला होना चाहिए।
6. चिकित्सा व भोजन में कम से कम एक घण्टे का अन्तर रखना चाहिए।
7. चिकित्सक के हाथ के नाखून व्यवस्थित होने चाहिए।
8. रोगी की शारीरिक क्षमता, रोग एवं प्रेशर देने का अंग देखकर रोगी को सहन करने लायक दबाव देना चाहिए।
9. बायें हाथ या पैर में पहले तथा दायें में बाद में दबाव देना चाहिए।
10. ध्यान रखें कि दबाव क्रिया आरम्भ करने से पूर्व रोगी ने मल-मूत्र विसर्जन किया हुआ हो।
11. भूखे पेट रोगी को चिकित्सा नहीं चाहिए।
12. चिकित्सा और स्नान के बीच कम से कम आधे घण्टे का अन्तर होना चाहिए।
13. गर्भवती महिला के लिए यह चिकित्सा वर्जित है।
14. फ्रेक्चर, चोट अथवा ऑपरेशन वाले स्थानों पर चिकित्सा नहीं करनी चाहिए।
15. किसी भी प्वाइंट पर दबाव सात सैकण्ड से लेकर एक मिनट तक दिया जा सकता है। पूरे उपचार का समय 20 से 30 मिनट तक होना चाहिए।
16. हड्डी पर प्रेशर नहीं देना चाहिए।
17. किसी भी बिन्दु पर दबाव देने के बाद थोडा झटका देकर छोडें, इससे रक्त का दौरा बढता है।
18. यदि रोगी किसी दवाई का प्रयोग कर रहा है तो दवा और एक्युप्रेशर चिकित्सा में कम से कम एक घण्टे का अन्तराल रखें।
19. एक ही रोगी में कई प्रकार के रोग होने की स्थिति में सबसे पहले गम्भीर रोग का उपचार करना चाहिए।
20. जिस प्वाइंट पर आप प्रेशर दे रहे है, यदि उस स्थान पर रंग पिंक हो जाये, तो वहां प्रेशर न दें। एक्युप्रेशन के लाभ
1. इस चिकित्सा में शरीर में रक्त का स†चार ठीक हो जाता है।
2. त्वाचा में स्फूर्ति पैदा होती है।
3. शरीर की रोग-प्रतिरोधकशक्ति का विकास होता है।
4. सम्पूण शरीर सक्रिय रहता है एवं सुचारू रूप से कार्य करता है।
5. स्वभाव में परिवर्तन होता है।
6. यह कम खर्चीली और बिना दवाई की चिकित्सा है।
7. यह घर पर भी आसानी से की जा सकती है।
8. यह पीडा रहित एवं सुरक्षित है। एक्युप्रेशर द्वारा सिरदर्द का उपचार सिरदर्द भी एक सामान्य रोक की भांति होता है। शायद ही कोई ऎसा व्यक्ति होगा, जिसे सिरदर्द नहीं हुआ हो। सिरदर्द का सीधा सम्बन्ध स्मरणशक्ति पर पडता है। जितना अधिक सिरदर्द होगा, उतना वस्तुओं को स्मरण करने की शक्ति कम होगी। इसलिए एक्युप्रेशर तकनीक का प्रयोग करके काफी हद तक तेज सिरदर्द से निजात पाया जा सकता है। यदि सिर के प्रेशर बिन्दुओं पर नियमित रूप से तीन सैकण्ड तक दबाव डाला जाये, तो तेज सिरदर्द से मुक्त मिलती है। हाथों और पांवों में और अंगुलियों और तलवों पर दबाव दिया जाना चाहिए। हाथों में एनर्जी रोल से प्रेशर दें। पांवां में एक्युप्रेशर और पिरामिड प्लेट पर पंजे के बल खडे होकर कदमताल करें। इसके अलावा सुबह शाम हेड बेल्ट का प्रयोग कर से कम आधा घण्टे तक करें।

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